रांची। देशभर में मानव-हाथी संघर्ष गंभीर समस्या बनता जा रहा है। 2019 से 2024 के बीच हाथियों के हमलों में 2,829 लोगों की मौत हुई है। इनमें ओडिशा (624 मौतें) और झारखंड (474 मौतें) सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य हैं। पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़ भी नुकसान झेल रहे हैं।

झारखंड में संकट क्यों गहराया

झारखंड के सरायकेला-खरसावां, लातेहार, गुमला और पश्चिम सिंहभूम जिले संघर्ष के सबसे बड़े केंद्र बने हैं। कोयला खनन और बस्तियों के विस्तार ने प्राकृतिक एलीफेंट कॉरिडोर नष्ट कर दिए, जिससे हाथी भटककर गांवों में घुस आते हैं। हाथी फसलें नष्ट करते हैं, जिससे किसानों में आक्रोश बढ़ रहा है। वन विभाग ने ड्रोन और रैपिड रिस्पांस टीम तैनात की हैं, लेकिन हालात काबू में नहीं हैं।

ओडिशा की स्थिति

ओडिशा में हाथियों की संख्या भले ही कम (1,976) हो, लेकिन संघर्ष सबसे ज्यादा है। ढेंकानाल (31 मौतें), अंगुल (24), सुंदरगढ़ (22) और क्योंझर (18) सबसे प्रभावित जिले हैं। राज्य सरकार ने ‘जना सुरक्षा, गजा रक्षा’ योजना के तहत सोलर फेंसिंग और कुमकी हाथियों का इस्तेमाल शुरू किया है, लेकिन मौतें रुक नहीं रही हैं।

एलीफेंट कॉरिडोर का संकट

झारखंड के सारंडा से लेकर ओडिशा के सुंदरगढ़ तक फैला प्राकृतिक हाथी गलियारा खनन से बर्बाद हो गया है। यही वजह है कि हाथी 12-18 घंटे भोजन की तलाश में भटकते हुए मानव बस्तियों में प्रवेश कर जाते हैं।

हाथियों का भी नुकसान

मानव ही नहीं, हाथियों को भी भारी हानि हो रही है। 2019-24 में 528 हाथियों की मौत हुई है, जिनमें से 392 विद्युत झटके से मारे गए।
पूर्वी राज्यों में देश के सिर्फ 10% हाथी रहते हैं, लेकिन यहां 55% मौतें हो रही हैं।

समाधान की दिशा

केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत 33 हाथी रिजर्व बनाए हैं, जिनमें एक झारखंड में है। विशेषज्ञों