चित्रकला और लेखनी के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का हुनर दिखा रहा है कराहल का आदिवासी युवक रामलखन
कराहल जैसे आदिवासी बहुल और वनवासी क्षेत्र में जहां संसाधनों की कमी और अवसरों का अभाव सामान्य बात है, वहीं सहरिया समुदाय से आने वाले एक युवा कलाकार रामलखन आदिवासी ने अपने हुनर से एक मिसाल कायम की है। रामलखन चित्रकला और दीवार लेखन के माध्यम से न केवल अपनी प्रतिभा को निखार रहे हैं, बल्कि इसे अपनी आजीविका का माध्यम भी बना चुके हैं।
चित्रकला और लेखन, जो आमतौर पर बड़े शहरों या विशेष प्रशिक्षण प्राप्त लोगों से जुड़ा क्षेत्र माना जाता है, उसे रामलखन ने आत्मनिर्भरता और मेहनत के बल पर अपनाया है। वर्तमान में वे शासकीय विभागों द्वारा करवाए जा रहे दीवार लेखन और चित्रांकन के कार्यों में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं। उनका कार्य न सिर्फ आमजन का ध्यान आकर्षित कर रहा है, बल्कि स्थानीय अधिकारियों द्वारा भी सराहा जा रहा है।
वनांचल क्षेत्र में सहरिया जनजाति से आने वाले रामलखन अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने कला के इस क्षेत्र में कदम रखा है और उसे पेशेवर रूप दिया है। उनकी दीवारों पर की गई पेंटिंग्स और शुद्ध, आकर्षक लेखनी सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार में भी सहायक बन रही हैं।
रामलखन का कहना है कि उन्होंने यह कला स्वयं सीखी है और अब वे चाहते हैं कि क्षेत्र के अन्य युवा भी इस ओर प्रेरित हों। उन्होंने क्षेत्रवासियों से अपील की है कि वे इस कार्य में उनका सहयोग करें, जिससे वे और भी बेहतर कार्य कर सकें और अपनी कला को और ऊँचाइयों तक ले जा सकें।
रामलखन की यह यात्रा यह संदेश देती है कि यदि संकल्प मजबूत हो, तो संसाधनों की कमी भी राह का रोड़ा नहीं बनती। कराहल जैसे अंचल में कला और आत्मनिर्भरता का यह उदाहरण निश्चित ही कई युवाओं को प्रेरणा देगा।

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